“Kitni jaldi bade ho gye na hum”

जब पैर कम पर जाते थे चलने को,
हाथो का सहारा लेते थे,
होकर छंद किलो के,
मा बाप को टनो का बोझ देते थे ।

बोझ तो अब भी कहा कम हुआ ?
कस्ट तो हम आज भी देते है,
उस समय तो ये नादानी थी,
पर अब इसे जुर्म कहते है ।

काश यूँही समय जाता थम ,
पर कितनी जल्दी बड़े हो गए न हम ?

माँ हाथो से रोटी खिलाती थी ,
हर रात गरम दूध पिलाती थी ,
पापा काम से थक कर घर आते थे,
पर मेरे एक कहने पे घोरा बन जाते थे ।

आज भी माँ ही रोटियां बनाती है ,
पर वो खिलाने वाले हाथ नज़रो के सामने नहीं आते ,
पापा का प्यार ज़रा भी कम नहीं हुआ ,
पर अब वो मेरा घोरा नहीं बन पाते ।

काश यूँही समय जाता थम ,
पर कितनी जल्दी बड़े हो गए न हम ?

याद है जब पहली बार चलना शिखा था ?
मै ख़ुशी से खूब चीखा था ,
मा-पापा की आखें भर आई थी ,
लगा भारत कोई वर्ल्ड कप जीत कर आई थी ।

अब तो दौरना भी आ गया है ,
समय से भागने का जरिया ढून्ढ रहे है,
पहले बड़ी खुशियों की वजह छोटी हुआ करती थी,
अब छोटी खुशियों की वजह ढून्ढ रहे है ।

काश यूँही समय जाता थम ,
पर कितनी जल्दी बड़े हो गए न हम ?

चोट्टे तो बहुत खायी है बचपन में ,
हलकी ठोकरो पर ही नदी बहा देते थे ,
चाहे निर्जीव वस्तु ही कारन हो ,
पापा उसे भी पीट देते थे ।

ठोकरें तो आज भी खा रहे है ,
बचपन के पन्ने भी कम होते जा रहे है ,
केहने को तो पूरी ज़िन्दगी बाकी है अभी ,
पर वो बचपना और मासूमियत खोये कही जा रहे है ।

काश यूँही समय जाता थम ,
पर कितनी जल्दी बड़े हो गए न हम ?

किस बात की चिंता की थी मैंने ,
हर वक्त राजा बन राज ही तो किया था ,
शायद खुश नसीब ही हु मैं ,
की ज़िन्दगी की शुरुआत में बचपन मैंने जिया था ।

कहते है १८ की उम्र के बाद ,
बच्चा बड़ा हो जाता है ,
ये मुकाम भी हासिल होने वाला है,
बस कुछ बनने का ख्याल बड़ा सताता है ।

काश यूँही समय जाता थम ,
पर कितनी जल्दी बड़े हो गए न हम ?

जब कुछ अलफ़ाज़ बोलना चाहता था ,
तब हल्का हल्का तुतलाता था ,
कहि गलती कर के आया ,
तो माँ को ही बुलाता था ।

अब गलतियां कर के बचने को ,
मा बाप का सहारा नहीं ले सकते ,
गलतियाँ तो आज भी सब करते है,
पर कम ही लोग इसका जुर्माना भरते है ।

काश यूँही समय जाता थम ,
पर कितनी जल्दी बड़े हो गए न हम ?

बचपन की कहानियां अलग थी ,
किससे भी कुछ अजीबो गरीब थे ,
पर कुछ तो बात है उस समय में ,
शायद प्रेम और सुकून सबसे करीब थे ।

ज़िन्दगी का सिलसिला आज भी जारी है ,
शुरु करनी अभी एक अनोखी पारी है ,
लगता है मैदान कुछ बदल सा गया है ,
वह समय तो अपना था पर ये कुछ नया है ।

काश यूँही समय जाता थम ,
पर कितनी जल्दी बड़े हो गए न हम ?

-Ayush Gupta

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