Maa-Papa ka Milan (Poem on Parent’s Marriage)

विवाह ज़िन्दगी का एक अहम मोड़ है,
दो दिलो को बाँधने वाली मजबूत डोर है,
वरना छोड़ ना जाने कितने शहर और ज़िले,
इतनी आबादी मे यही दोनों क्यूँ मिले?

जब देश मे शादियो का शोर था,
मुझसे ज्यादा खुश ना कोई और था,
मैं ख़ुदा से धरती पर जन्म लेने की मांग कर रहा था,
बातचीत के साथ साथ अपने मांगो का चिठ्ठा भर रहा था|

रब ने पूछा की बता, क्या लिखा? जो मुझसे छुपा रहा है, वह जल्दी दिखा,
मैंने भी ख़ुशी से मना कर दिया,
उनके हाथों मे जाकर खाली कटोरा धर दिया|

उन्होंने आखिर पूछ ही लिया,
कि कैसे माँ बाप चाहिए तुझको?
अगर ये गुप्त ना हो,
तो जरा बता दे मुझको|

मैं बोला- मौला! ऐसा पिता देना,
जो कभी डाटता ना हो,
और मेरी चीज़ो को,
औरो मे बांटता ना हो|

अल्लाह! ऐसी माँ देना,
जो मुझे कभी किसी काम के लिए, रोके ना,
चाहे जितनी बड़ी आजादी हो,
मुझे कभी भी टोके ना |

भगवन कि आँखें लाल हो गयी,
क्रोध मे बोल उठे,
कितना खुदगर्ज है रे तु,
तु तो निर्जीव ही बन, तुझे माँ बाप क्यूँ दु?

बोले सुन रे मूर्ख,
पिता नारियल का प्रतिरूप होगा, कहने को तो कमायेगा दो आना,
पर पेट काट कर भी खिलायेगा चार दाना|

माँ चाँद कि परछाई होगी,
तेरे जीवन मे हमेशा रौशनी कि ज्योत जलाई होगी,
तु दुःख मे होगा तो उसे कष्ट होगा,
किसी खुशनसीब को ही इनकी गोद का सुख प्राप्त होगा|

मेरी आँखों मे आँसू आ गए,
रोने का फिर भी हक़ ना था मुझे,
एक नयी रिश्ते कि शुरुआत का संखनाद हुआ,
आज भी खुश हुँ कि ठुकराई ख़ुदा ने मेरी वह दुआ|

वो दिन था उनके मिलन का,
आज भी यह दिन सबसे ख़ास है मेरे लिए,
अच्छा हुआ ख़ुदा से नहीं लड़ा मैं,
खुशनसीब हुँ कि उन्होंने मुझे ये माँ बाप दिए|

— आयुष गुप्ता

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