“Safar se manzil tak” (A life changing journey to the rural)

ठंडियों का दिन था,
मै यूँही अपने हाथ सेक रहा था,
पर कोई मुझे अचंभित, देख रहा था,
गर्माहट के लिए मैं जिन लकड़ियों को जला रहा था,
वों उन्ही से अपना घर बना रहा था।

थोड़ी अजीब स्तिथि थि,
माफी तो मैं मांग न पाया,
मुझपर चढ़ा था अभिमान का साया,
मैन थमा और आगे बढ़ गया,
ना जाने अनजाने किस पर चढ़ गया ।

नीचे देखा तोह चीख निकली ,
गोबर पर मेरे पाँव थे ,
उध्र ही एक औरत के चेहरे पर अलग ही ताव थे ,
मैने जिस गोबर पर पाँव रखे थे ,
उसने वह घर पर सवार रखे थे ।

मैंने आगे बढ़ने का ठान लिया ,
पाव धोने के लिए पानी मिल गया ,
पर कुछ ऐसा देख की मेरे आँखों का पर्दा सिल गया ,
एक तरफ मैं उस पानी में गोबर वाले पाँव धो रहा था ,
दूसरी ओर कोई उसी पानी में अपनी सब्जियां भिगो रहा था ।

पर वही हुआ,
मैन यूंही आगे चलता गया ,
सूरज भी अपनी मर्जी अनुसार ढलता गया ,
आंगे एक गाय ने मुझे चाटना शुरू कर दिया ,
पर फिर कुछ ऐसा देखा जिसने मेरी आँखों को भर दिया ।

ये आम बात नहीं थी मेरे लिए ,
अभी उस गाय ने चाटना ख़तम ही किया था ,
उस बच्चे ने भी अभी दो घूंट ही पिया था ,
मैन देखा एक बालक जो अपनी जिंदगी अचिन्तित जी रहा था ,
वः एक गाये से सीधा दूध निकाल कर पी रहा था ।

मैं तो यूंही सेहर से एक गांव की तरफ आया था ,
मुझे क्या पता था की असली जीवन यही समाया था,
ये सफर कम सीख थी मेरे लिए ,
की ज़िन्दगी को जिए तो कैसे जिए|

ये खुदा की मर्ज़ी ही समझूंगा ,
की इतना फर्क कर दिया मानव जात में ही ,
इनहे मज़बूर या लाचार तो नहीं समझूँगा ,
खुद को ही शायद सबसे कमजोर समझूंगा ,
इतना काम हो्के भी कितना कुछ है इनके पास ,
घर छोटा ही सही पर एक सुकून की सास ।

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